हउमैं (अहंकार) का सबसे बड़ा तोड़ (उपचार)
साध संगत जी, यह घटना दिल्ली की है। बाबा नंद सिंह साहिब दिल्ली से बाहर के जंगलों में ठहरा करते थे। वह जगह उस समय ‘खूनी नाला’ के नाम से जानी जाती थी। बहुत बड़ा जंगल था। बाबा नंद सिंह साहिब उस जंगल में जाकर पड़ाव करते थे। दिल्ली की संगत दर्शनों के लिए बहुत उत्साहपूर्वक पहुँच जाती थी। बहुत लोग जाते थे। उस समय जाने के साधन तो दो-तीन ही थे। ज़्यादातर लोग पैदल जाते थे। कुछ लोग साइकिलों पर जाते तो कुछ लोग तांगों पर बैठकर जाते थे। जंगल के जितने नज़दीक तांगे जा सकते थे, तांगे वहाँ पहुँच कर खड़े हो जाते। सवारियाँ उतरकर अपने आप जंगल में चली जातीं। एक दिन क्या घटना हुई! कुछ नौजवान लड़के पैदल चले जा रहे थे। अब जिस तरह की टिप्पणी करने की लड़कों की आदत होती है एक लड़के ने टिप्पणी की, कि- यह साध (संत) कैसा है, जो नगर में आता नहीं, शहर में प्रवेश नहीं करता । पैदल जाते समय संगत को इतनी तकलीफ होती है । ये जो इतने लोग पैदल आते हैं, साइकिलों पर आते हैं, यदि साध खुद शहर में आ जाये तो हम सब इस तकलीफ से बच सकते हैं। इस तरह उसने टिप्पणी की और उसके साथी उसकी इस ट...