जन नानक सतिगुरु तिना मिलाइओनु जिन सद ही वरतै नालि॥
ये दो घटनाएँ थाना बाघा पुराना तहसील मोगा (अब ज़िला) में घटित हुई थीं। अपनी जवानी और नौकरी की पहली अवस्था में घोड़े पर सवार होकर बाबा नरिन्दर सिंह जी अपनी घुड़सवार सहायक टुकड़ी के साथ रात को डाकुओं के पीछे निकल पड़े। अमावस की अंधेरी रात थी। जंगल में किसी चीज़ को देखकर घोड़ा बिदक गया और बेलगाम होकर सरपट भाग लिया। भागते-भागते घोड़ा किसी ओर बहुत दूर निकल गया और वो ऐसे लम्बे सघन वृक्षों के झुण्डों के बीच से निकला, जिन वृक्षों के ऊपर से बहुत ही भयानक आवाजों का आना शुरु हो गया था। पिताजी के दिल में इस बात का अफ़सोस था कि बड़े खतरनाक डाकू हाथ से निकल जाएँगें, क्योंकि पीछे छूट गए अधीनस्थ पुलिसमैन पिताजी की आज्ञा के बिना कुछ भी नहीं कर सकते थे। घोड़ा तो काबू में आ चुका था, पर रास्ते का पता लगना असम्भव-सा हो गया था और यह भी नहीं सूझ रहा था कि किस तरह अधीनस्थ घुड़सवार पुलिस को मिला जाये। वे ऐसा सोच ही रहे थे कि घोड़ा एक दोराहे पर पहुँच गया। पिताजी निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि किस ओर निकला जाये। तभी अकस्मात एक प्रकाश-पुंज प्रत्यक्ष हुआ, जिसमें से भगवान कृष्ण का वह स्वरूप, तत्काल प्रत्यक्ष होकर ...