हज़ूर बाबा हरनाम सिंह जी महाराज (भुच्चो कलां वाले)- बाबा जी के प्रकाश पर्व को समर्पित
बाल्य-काल बाल्य-काल में इस पवित्र बालक को कभी किसी ने रोते या हँसते नहीं देखा। कभी वह दूध के लिए नहीं रोया , न उसने कुछ खाने को माँगा। वे भूख व प्यास की मानवीय कमजोरियों से ऊपर उठे हुए थे। गर्मी या सर्दी से भी वे प्रारम्भ से ही निःस्पृह थे। प्रसन्नता या क्रोध से पूर्ण रूप से मुक्त थे। उन की कोई आकांक्षा नहीं थी तथा वे सांसारिक आकर्षणों से एकदम परे थे। वह सदा गहन समाधि में लीन रहते तथा उन का मुखमण्डल सूर्य की किरणों की तरह चमकता रहता था। वह सदैव प्रभु-प्रेम के परम आनंद की स्थिति में रहते थे। उनके मुख-मण्डल से आभा की अनोखी किरणें फूटती थीं। एक बार अपनी युवावस्था में जब वे अँधेरे कमरे में समाधि लगाए थे , उनकी आभा से सारा कमरा आलोकित हो उठा। भूख या प्यास , दुःख या सुख , गर्मी या सर्दी से वे अप्रभावित थे। वे बाल्यकाल में ही इन सभी पर विजय प्राप्त कर चुके थे। वे कभी भी क्रोध नहीं करते थे। सभी परिस्थितियों में उन का हृदय शान्त रहता था। उनके आभा-मण्डित चेहरे से उस शाश्वत आनंद का प्रकाश और सुगंध बिखरती थी , जिसमें वे सदा मग्न रहते थे। उनके जीवन की दो घटनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन से इस ...