मुक्तियाँ ताँ बाबा नंद सिंह साहिब दे कुत्ते वी बक्श सकदे हन।
सालाना समागम से एक दिन पहले की बात है। एक बार ये दास भी पिताजी के साथ जा रहा था। जिस समय आदरणीय बाबा जी की कुटिया के स्थान पर पहुँचे तो वहाँ सबसे आगे बाबा जी के ठाठ के बाहरी द्वार पर बाबा नंद सिंह साहिब का कालू कुत्ता बैठा था। तब तक बाबा नंद सिंह साहिब अपनी जीवन लीला समेट चुके थे। पिताजी एकदम खडे़ हो गए उन्होंने बड़े प्यार से कालू को अपनी गोद में लिया और उसके आगे के दोनों चरण अपने माथे पर लगाए। संत सुजान सिंह जी उस समय साथ चल रहे थे, ये देखकर वे हँस पड़े। उन्होंने कहा- कप्तान साहिब ये क्या कर रहे हो? पिताजी कहने लगे- यह बाबा नंद सिंह साहिब का कालू कुत्ता है। जो उनके दर को छोड़कर कभी कहीं नहीं गया। जिस समय साहिब बाहर तशरीफ ले जाते थे तो ये भौंकता था और दुम हिलाते हुए उनके चरणों से लिपट जाता था। तब वे अपनी सोटी (छड़ी) का स्पर्श कराकर उसे प्यार किया करते थे। इसी कारण मैं इसके चरणों को अपने मस्तक पर लगा रहा हूँ। संत सुजान सिंह जी पिताजी के साथ मजाक कर बैठे, उन्होंने कहा- कप्तान साहिब यदि इस तरह की बात है तो आप ही यहाँ बन के बैठ जाओ। पिताजी ने जवाब दिया है- मेरी पुकार देखो, म...