बाबा जी का चौथा और पाँचवां नियम

 



बाबा जी का चौथा नियम

नंद सिंह दी इक सुई दे नक्के जिनी मैर न होवे
(नंद सिंह की सुई के छिद्र जितनी निशानी भी न हो)

बाबा नंद सिंह साहिब ने अपने अगले नियम का दृढ़तापूर्वक पालने करते हुए सुई के छिद्र जितनी ज़मीन भी अपने लिए नहीं बनाई।

जिस समय बाबा हरनाम सिंह साहिब ने, बाबा नंद सिंह साहिब से पूछा कि माँगो क्या माँगते हो, तो उन्होंने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि नंद सिंह के नाम तो सुई के छिद्र जितनी धरती भी न हो।
साधसंगत जी, बाबा नंद सिंह जी महाराज ने अपने नाम की कोई निशानी नहीं रखी। 

वे फरमाया करते थे कि हम तो निशानियाँ मिटाने आए हैं, बनाने नहीं। इस नश्वर संसार में गुरुमुख ने कोई निशानी बनानी है या उन निशानियों को मिटाना है? 

वे फरमाने लगे कि एक गुरुमुख, जिसका मुख हमेशा गुरु की तरफ लगा रहता है, जिसका प्यार हर समय अपने गुरु के चरणों में जुड़ा रहता है, वह कभी क्या पीछे मुड़कर देखेगा कि इस फानी, नश्वर संसार में, इस मृत्युलोक में उसकी भी कोई निशानी या यादगार बनी हुई है। साध संगत जी, बाबा जी की ज़िंदगी में इस प्रकार की भौतिक निशानियों का मोह असंभव था। इस तरह बाबा नंद सिंह जी साहिब ने कोई संशय नहीं रहने दिया।

बाबा जी दे दर ते,
कामिनी कंचन दा स्थान नहीं है।
बाबा नंद सिंह जी दे दर ते,
कोई माया परवान नहीं है।


वो पूरने कोई नहीं पा सकदा,
जो पूरने बाबा जी तुसी पा गए ओ।
गुरु ग्रंथ दी जोत विच्चो,
निरंकार नूँ परतख दिखा गए ओ।


कदे माया नूं हथ न लाउण बाबे,
ऐने बेपरवाह हजूर हुन्दे।
एक तिल दी तमा न रक्खण बाबे,
जोत नूरो नूर हुन्दे।


सुई दे नक्के जिनी शै,
बनाई नहीं अपनाई नहीं।
ऐसी खेड रचा गए ने,
वाह-वाह बाबा नंद सिंह जी।


कोई निशानी पाई नहीं
भोरे तक भी ढवा गए ने।
गुरु ग्रंथ दे नाम ते अपणा
नाम ते निशान मिटा गए ने।


वाह-वाह बाबा नंद सिंह जी,
तेरा आउणा न्यारा।
गुरु ग्रंथ ते घोल घुमाया,
अपना जीवण सारा।


वो पूरने कोई नहीं पा सकदा,
जो पूरने बाबा जी तुसी पा गये ओ।
गुरु ग्रंथ दी जोत विच्चो,
निरंकार नूँ परतख दिखा गये ओ।

बाबा जी का पाँचवां नियम

उस्तत सिर्फ गुरु नानक दी, निंदिआ सिर्फ आपणी
(स्तुति सिर्फ गुरु नानक की निंदा सिर्फ अपनी)

बाबा नंद सिंह साहिब का एक नियम यह था कि स्तुति तो सिर्फ गुरु नानक की है और निंदा सिर्फ अपनी।
गुरु नानक पातशाह फ़रमाते हैं-
प्रेम पराइण प्रीतम राउ ॥
नदरि करे ता बूझै नाउ ॥

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 222

उस निरंकार अकाल परमेश्वर के बारे में वे फ़रमाते हैं कि वे किसके परायण हैं? वे स्वयं ही प्रेम-परायण हैं।

बाबा नंद सिंह साहिब ने गुरु नानक पातशाह और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के परायण होकर अपने सम्पूर्ण जीवन को अर्पित कर दिया। साधसंगत जी, इसमें कोई संशय वाली बात नहीं।

पोथी परमेसर का थानु ॥

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1226

वाहु वाहु बाणी निरंकार है 

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 515

बाणी गुरू गुरू है बाणी

श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 982

 
यह परमेश्वर, यह निरंकार, गुरु नानक कहाँ प्रत्यक्ष होंगे? प्रकट कहाँ दिखेंगे? मेरे बाबा नंद सिंह जी ने ही उन्हें प्रत्यक्ष किया है, उन्हें अपने प्रेम से प्रकट किया है। जिस प्रकार निरंकार स्वरूप गुरु नानक और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति बाबा नंद सिंह साहिब प्रेमपरायण थे,
उसी प्रकार निरंकार परमेश्वरस्वरूप श्री गुरु ग्रंथ साहिब और गुरु नानक पातशाह भी बाबा नंद सिंह साहिब के प्रेम परायण हो गए।

गुरु नानक दाता बख़्श लै, बाबा नानक बख़्श लै।

(Smast Ilahi Jot Baba Nand Singh Ji Maharaj, Part 4)

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