बाबा जी का दूसरा और तीसरा नियम - कंचन और कामिनी
अपने अनमोल और पावन वचन रखते हुए पिताजी बाबा नंद सिंह साहिब के दूसरे व तीसरे प्रकाशमय नियम के बारे में बता रहे हैं। प्रारंभ में ही उन्होंने बताया कि मेरे साहिब निरंकार गुरु नानक पातशाह इस कंचन और कामिनी के बारे में फरमा रहे हैं-
नानक सचे नाम बिनु किसै न लथी भुख ॥
रूपी भुख न उतरै जां देखां तां भुख ॥
जेते रस सरीर के तेते लगहि दुख ॥
कूड़ु मंडप कूड़ु माड़ी कूड़ु बैसणहारु ॥
कूड़ु सुइना कूड़ु रुपा कूड़ु पैन्हणहारु ॥
कूड़ु काइआ कूड़ु कपड़ु कूड़ु रूपु अपारु ॥
कूड़ु मीआ कूड़ु बीबी खपि होए खारु ॥
कूड़ि कूड़ै नेहु लगा विसरिआ करतारु ॥
किसु नालि कीचै दोसती सभु जगु चलणहारु ॥
कूड़ु मिठा कूड़ु माखिउ कूड़ु डोबे पूरु ॥
नानकु वखाणै बेनती तुधु बाझु कूड़ो कूड़ु ॥
गुरु नानक देव जी
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 468
ऐसे पावन शब्दों में गुरु नानक पातशाह कंचन और कामिनी के विषय में प्रकाश डाल रहे हैं।
साधसंगत जी, माया के दो रूप हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक है कंचन, सोना। दूसरा है कामिनी, कामिनी का रूप।
साहिब पहले शब्द के बारे में समझा रहे हैं कि यह जो कंचन है, यह जो दुख है, इसे प्राणी ने आप ही सहेजा हुआ है। यह दुख-ही-दुख है। फिर जिस समय कामिनी के रूप की बात करते हैं, उस समय गुरु नानक पातशाह फरमाते हैं कि इस रूप की भूख पर काबू पाना असंभव है, मुश्किल है, अति कठिन है। साध संगत जी फिर पिताजी ने एक पावन वृत्तांत सुनाया-
बाबा नंद सिंह साहिब हरिद्वार के जंगलों में भ्रमण कर रहे थे। एक स्थान पर देखा कि एक संत मंडली विराजित है। अनेक संत अपने पूज्य मुख्य संतजी के चरणों में विराजमान हैं और चर्चा चल रही है। बाबा नंद सिंह साहिब वहाँ आकर पीछे बैठ गए। उन्होंने सुना कि चर्चा का विषय था कंचन और कामिनी। इस घोर अंधकारपूर्ण कलियुग में माया के इन दो रूपों पर क्या कोई विजय हासिल कर सकता है?
मंडली के बीच से दो-तीन शिष्य हाथ जोड़ करके अपने पूज्य मुख्य संत जी से पूछने लगे कि गरीब निवाज़ आप तो बड़ी कमाई और करनी वाले हैं। आप ही माया के इन दोनों रूपों पर अपने अनुभवों के विषय पर प्रकाश डालिए।संत जी थोड़ी देर के लिए चुप हो गए, फिर फ़रमाने लगे कि- जहाँ तक कंचन का सवाल है, वह हमें मोह नहीं सकता, वह हमें आकर्षित नहीं कर सकता। कामिनी के रूप का जो प्रश्न आपने हमसे पूछा है उस विषय में हम स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हमें यदि इसका परचा (परीक्षा) पड़ जाए तो दावे के साथ नहीं कह सकते कि हम उस परीक्षा में खरे उतर जाएँगे। फिर स्वाभाविक ही उन शिष्यों ने पूछा कि इस घोर अंधकारपूर्ण कलियुग में क्या कोई ऐसा महापुरुष है, जिसने माया के इन दोनों रूपों पर विजय पा ली हो?
मुख्य संत जी अंतर-ध्यान में चले गए हैं। कुछ क्षणों उपरांत उन्होंने नेत्र खोले और जवाब दे रहे हैं कि- इस घोर अंधकारपूर्ण कलियुग में माया के इन दोनों रूपों को विजित किया हुआ है, जिन्होंने कंचन और कामिनी के आकर्षण को भी मार दिया है, प्रताड़ित किया है, विजय हासिल कर ली है, वह महापुरुष तो इस समय संगत में सबसे पीछे बैठा हुआ है। इतना कहकर के उन्होंने बाबा नंद सिंह साहिब का नाम लिया और कहा कि यह बाबा नंद सिंह साहिब हैं जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में लेशमात्र भी इस उपलब्धि का अभिमान अपने उपर नहीं आने दिया। जिन्हें लेशमात्र भी अभिमान छू नहीं सका। उन बाबा नंद सिंह साहिब को तिलभर भी तमा (स्वार्थ, लालच, इच्छा) नहीं है। वे पूरी तरह से बेमुहताज और बेपरवाह हैं। देखते ही देखते बाबा नंद सिंह साहिब वहाँ से चल दिए। वह गुरु नानक के चरणों का प्रकाश था, जो वहाँ से उठकर पीछे की ओर चला जा रहा था।
(मुखी संतजी अन्तरध्यान हो गये हन, नेत्र खोले हन ते जवाब दे रहे हन कि इस घोर अन्ध्कार कलियुग विच जिसने फ़तह कीता होइआ है इस माया दे दोवें रूपा नूँ, जिने वंफचन ते कामिनी दे रूप नू वी मारिया होइआ, लताड़िआ होइआ है, फ़तेह कीता होइआ है उह महापुरुष तां इस बेले साडे इकट्ठ दे विच सबतों पिछे बैठा है। इना कहके नाम लिया है उन्होंने बाबा नंद सिंह साहिब दा, ते बाबा नंद सिंह साहिब जिन्हांने इक लेशमात्र मान सारी जिन्दगी आपणे उत्ते नहीं लिया, जिन्हानूँ लेशमात्र मान छू नहीं सकिआ, बाबा नंद सिहं साहिब जिन्हानूँ इक तिल दी तमा नहीं, पूर्ण तौर ते बेमुहताज ते बेपरवाह हन। उह गुरु नानक पातशाह दे चरण कमलां दा प्रकाश सी, उथों उठके पिच्छे तुरिआ जा रिहा सी।)
साधसंगत जी, यह दूसरा नियम बाबा नंद सिंह साहिब जी का था कि कभी पैसों को हाथ ही न लगाना। अपने संपूर्ण जीवन काल में बाबा नंद सिंह साहिब ने पैसे को हाथ लगाकर देखा ही नहीं कि वह लगता किस तरह का है?
उनका तीसरा नियम था कि कभी भी किसी अकेली स्त्री से भेंट नहीं करनी, उससे बात ही नहीं करनी। अपनी सारी ज़िंदगी में बाबा नंद सिंह साहिब ने अकेली स्त्री से कोई बात ही नहीं की और न ही किसी अकेली स्त्री को दर्शन दिए।

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