एक बार गुरु अरजन पातशाह बाबा श्री चंद जी महाराज के चरणों में तशरीफ़ लाए। वे गुरुद्वारा बारठ साहिब सुखमनी साहिब की 16 (सोलह) अष्टपदियों को पूरा करके लाए। उस समय बाबा श्री चंद जी महाराज समाधि में लीन थे। उनके सामने वह स्थान बना हुआ है, वो चबूतरा बना हुआ है जहाँ गुरु अरजन पातशाह हाथ जोड़कर खड़े हुए और तब तक खड़े रहे जब तक बाबा श्री चंद जी की समाधि नहीं खुली। इंतज़ार कर रहे हैं। जब समाधि खुली तो उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम किया।
बाबा श्री चंद महाराज ने आने का कारण पूछा । उस समय उनके श्री चरणों में सोलह अष्टपदीआं रखी और
फ़रमाया - गरीब निवाज़! ये बाणी उच्चारी है।
बाबा श्री चंद जी महाराज ने बाणी सुनी। बहुत प्रसन्न हुए और फ़रमाया कि आठ अष्टपदीआं और उच्चारो। तो नम्रता के पुंज, नम्रता स्वरुप गुरु अरजन पातशाह बाबा श्री चंद जी के चरणों में विनती कर रहे हैं कि गरीब निवाज़ आप अपने पवित्र मुख से बाणी उच्चारें।
उनकी नम्रता देखकर बाबा श्री चंद जी बहुत प्रसन्न हुए और फ़रमाया कि हम बाणी नहीं उच्चरित करेंगे। तो गुरु अरजन पातशाह ने विनती की कि गरीब निवाज़! आप अगुवाई करें। तब बाबा श्री चंद जी एक अष्टपदी उच्चारी और फ़रमाया- हम 17वीं अष्टपदी की शुरुआत अपने निरंकार पिता द्वारा उच्चारी हुई बाणी से ही करते हैं। उन्होंने उनके बीच थोड़ा अंतर रखा। साथ ही फ़रमाया - हम अपने निरंकार पिता की बराबरी नहीं कर सकते। कौन सा श्लोक उच्चारा?
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भी सचु नानक होसी भी सचु ॥
साध संगत जी, यह 17वीं अष्टपदी को आरम्भ कर दिया, शुरुआत स्वयं ही की है। बड़े अचरज की बात है कि जब साहिब श्री गुरु अरजन पातशाह सुखमणी साहिब आरम्भ करते हैं, उस समय पहला श्लोक उच्चारते हैं -
आदि गुरए नमह ॥
जुगादि गुरए नमह ॥
सतिगुरए नमह ॥
स्री गुरदेवए नमह ॥
श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 262
अब बाबा श्री चंद जी कौन सा श्लोक उच्चार रहें हैं-
आदि सचु जुगादि सचु ॥
है भी सचु नानक होसी भि सचु ॥
श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 285
अगर हम इन दोनों श्लोकों पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि यह सुखमणी साहिब है क्या? एक दिव्य रहस्य छिपा हुआ है इन दोनों श्लोकों के बीच। ऐसा गहरा संबंध है इन दोनों श्लोकों में। सुखमणी साहिब के इन दोनों श्लोकों के प्रकाश में हर इंसान, हर जीव नहा सकता है। गुरु अरजन पातशाह ने ऐसी युक्ति से बाबा श्री चंद जी के उस प्रकाश, उस नूर को सुखमणी साहिब की बाणी में उतारा है। जब हम 17वीं अष्टपदी का श्लोक पढ़ते हैं तो उनका वह प्रकाश तब दिखाई देता है, उनकी उपस्तिथि का अहसास होता है।
हमारे गुरु साहिबान इसी तरह अपने स्थान से चल कर बाबा श्री चंद जी के चरणों में हाज़िर होते रहे। उनके चरणों में हाज़िरी लगवाते रहे। जब श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब चारों साहिबज़ादों के साथ चरणों में हाज़िर हुए तो बाबा श्री चंद जी ने चारों साहिबज़ादों की और देखते हुए पूछा कि कौन सा साहिबज़ादा हमारी सेवा में पेश करोगे।
तब श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी ने फ़रमाया - गरीब निवाज़, यह चारों ही आपकी सेवा करेंगे। यह चारों ही आप की सेवा में हाज़िर हैं।
लेकिन उस समय, उनके सबसे बड़े साहिबज़ादे बाबा गुरदित्ता जी (जो श्री गुरु हरिराय साहिब के पूज्य पिता, श्री गुरु हरिकिशन साहिब के दादा, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब के बड़े भाई थे) की ओर इशारा करते हुए फ़रमाया कि आप अपना यह पुत्र हमें दे दो।
साध संगत जी, धन्य हैं बाबा श्री चंद साहिब! फिर उन्होंने अपनी सारी मुट्ठी (शक्ति), सब कुछ श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब के सबसे बड़े साहिबज़ादे बाबा गुरदित्ता जी को बख्श दिया।
जब हम गुरुद्वारा बारठ साहिब जाते थे, उस समय बैंड की सलामी देते थे और बैंड की सलामी के बाद, मेरी बहनें (बीबी भोलां, बीबी अजीत) जब आरता पढ़ती थीं, उस समय महसूस होता था कि बाबा श्री चंद साहिब हमारी अगुवाई कर रहे हैं। हमें लगता था कि वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब के सामने बैठे हैं, हम उनके पीछे बैठे हैं और वह हमारे साथ ही आरता पढ़ रहे हैं।
उस समय हमें ऐसा अनुभव होता था कि हम बैकुंठ में बैठे हैं। क्योंकि जहां भी उनकी आरता पढ़ा जाता है, वहां बाबा श्री चंद जी महाराज की उपस्थिति होती है। उनकी दिव्य उपस्थिति अवश्य है। वहां फिर वह वर...
जो जन नानक शाह का आरता गावै॥
बसै बैकुंठ परम गत पावै ॥
...वह तो बैकुंठ में निवास करता ही है।
आइए, हम भी बाबा श्री चंद जी महाराज की खुशियाँ और प्रसन्नता प्राप्त करें।
जो जन नानक शाह का आरता गावै॥
बसै बैकुंठ परम गत पावै ॥
आरता कीजै नानक शाह पातशाह का ॥
हरि हरि दीनु दुनिआं के शहिनशाह का ॥
गुरु नानक दाता बख़्श लै॥ बाबा नानक बख़्श लै॥
Smast Ilahi Jot Baba Nand Singh Ji Maharaj, Part 5
By: Brig. Partap Singh Ji Jaspal
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