सिक्ख की करनी ही सबसे बड़ा चमत्कार है।



पिताजी ने बहुत ही अनमोल और दुर्लभ दो-तीन चीजें बताईं-

पहली, सिक्ख कभी शक्ति का इस्तेमाल नहीं करता।

भाई मतिदास जी साहिब के चरणों में बैठे हैं। कैद में भाई मतिदास जी ने साहिब के चरणों में विनती की कि-

सच्चे पातशाह,  जिस प्रकार का दुःख और कष्ट यह यहाँ पर दे रहें हैं, मुझे आज्ञा दें, मैं लाहौर और दिल्ली की ईंट से ईंट बजा दूँगा।

गुरु तेग बहादुर साहिब ने भाई मतिदास जी की ओर देखा और फ़रमाया- मतिदास को यह शक्ति कहां से प्राप्त की है?

मतिदास जी ने विनय की- सच्चे पातशाह, एक दिन आपने गनेरियाँ (गन्ने के छोटे टुकड़े ) चूस कर फेंकी थी। मेरे हृदय में ऐसा वैराग्य आया, मन में आपके इस प्रेम रस को चखने की इच्छा हुई। आपकी चूसी हुई गनेरियाँ उठाईं और बड़े प्रेम से उस सीत प्रसाद को ग्रहण किया। एक दम के लिए ऐसा लगा जैसे कपाट खुल गए हों। एक महान शक्ति अंदर प्रवेश कर गई हो।

साहिब मुस्कुराए और कहने लगे- मतिदास, जिस ने गनेरियाँ चूस के फेंकी थी, यह शक्ति उस के पास नहीं है?

भाई मतिदास जी हाथ जोड़कर खड़े हो गए। साहिब उस समय अपने केशों में कंघा  कर रहे थे। उन्होंने कंघा दिखाया है। उन्होंने इशारा समझ लिया कि उन्हें आरे से चीरा जाना है। जब हाकम के पास यह शिकायत हुई, तो उन्होंने आदेश दिया कि गुरु साहिब के समक्ष, सबके सामने, पहली शहादत भाई मतिदास जी की, की जाए।

साध संगत जी गुरु तेग बहादुर साहिब के दो भ्राता, बाबा अटल जी, कोमल आयु में उनका एक साथी, एक बच्चा जो मर गया है। अपने छोटे से दोस्त को जब वे सुबह  खेलने के लिए लेने गए। उसकी बारी थी। उस समय, उस मृत बच्चे के माता-पिता रोते हुए उसे शमशान ले जाने वाले थे। बाबा अटल जी ने उसकी उंगली पकड़ कर उठाते हुए कहा कि आ अपनी बारी दे।

बाबा गुरदित्ता जी, गुरु तेग बहादुर साहिब के बड़े भ्राता, गुरु हरि राय साहिब के पूज्य पिता जी, गुरु हरिकृष्ण साहिब के पूज्य दादा जी। उन्होनें ने भी इसी तरह... चौबीस (24) वर्ष की अवस्था है।  बाबा श्रीचंद साहिब ने सारी शक्ति उन्हें बख्श दी थी। उन्होंने  भी इसी तरह जीवित कर दिया था।  लेकिन जब गुरु साहिब, गुरु हरिगोबिंद साहिब को दोनों घटनाओं के बारे में पता चला...।  साध संगत जी, आप इतिहास के अवगत हैं।

गुरु नानक के घर में शक्ति के प्रयोग की अनुमति नहीं है।

फिर बाबा अटल जी ने क्या किया? उन्होंने जाकर समाधि ले ली और समाधि में ही  महासमाधि में चले गए, प्राण त्याग दिए।

बाबा गुरदित्ता जी का स्थान भी (समाधि-स्थल) कीरतपुर साहिब में है, जहां जाकर उन्होंने समाधि ली तथा महासमाधि में चले गए।

पिता जी  कहने लगे- 

पुत्त, शक्ति तां गुरू दे चरनां विच्च रुलदी फिरदी है पर शक्ति इसतेमाल करन दी इज़ाज़त नहीं है।

(बेटे, शक्ति गुरु के चरणों में है, लेकिन उसका इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है।)

बाबा नंद सिंह साहिब ने फ़रमाया-

कोई शक्ति इस्तेमाल करनां, कोई करामात दिखाउंणा, इह सिक्ख दा कम्म नहीं। इह सिद्धां दा कम्म हैं। सिक्ख दी करनी ही सब तों वड्डी करामात हैं।

(कोई शक्ति प्रयोग करना, कोई भी करामात  दिखाना, यह सिक्ख का काम नहीं है। यह सिद्धों का काम है। सिक्ख की करनी ही सबसे बड़ा करामात है।)


फिर दूसरी चीज़, फ़रमाया-
 भाणे का नशा, सरूर, मस्ती लेता हुआ सिक्ख

भाणे जेवड होर दाति नाही सचु आखि सुणाइआ ॥

(गुरु अर्जन पातशाह ने यह आशीर्वाद दिया है) उस भाणे में रंगा हुआ सिक्ख कभी शक्ति का प्रयोग नहीं करता, न ही अपने लिए प्रार्थना करता है।

साध संगत जी, स्वार्थी प्रेम और सच्चे प्रेम में जमीन आसमान का अंतर होता है। स्वार्थी सिक्ख अपने स्वार्थ के लिए बहुत प्रार्थना करता है। लेकिन जो प्रेम में रंगा हुआ सिक्ख होगा, जो उसके भाणे का नशा ले रहा होगा, वह सिक्ख अरदास नहीं करता।

गुरु नानक दाता बख़्श लै बाबा नानक बख़्श लै

Nanak Leela, Part 2

 By: Brig. Partap Singh Ji Jaspal

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