दिव्य नाम

 

पूर्णमासी वाले दिन लाखों श्रद्धालुओं को दिव्य नाम का प्रसाद बाँटा जाता था और आने वाली पूर्णमासी तक पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हजारों पाठ पूरा करने की यह प्रक्रिया हर महीने दोहरायी जाती थी। इस पवित्र यज्ञ में हिन्दू और मुसलमान भाई पूरी उत्कंठा से ‘राम’ और ‘अल्लाह’ के दिव्य नामों से जुड़ जाते थे। सभी व्यक्ति परिवार समेत पूरी तत्परता और लगन से शामिल होते थे। इस वर्धनशील क्रिया को निरन्तर बढ़ाने हेतु एक सौ आठ मनकों की माला की जप-विधि सहायक होती है। 

दिव्य नाम को ज़ोर-ज़ोर अथवा चुपचाप जपने-दोहराने की अपेक्षा मन में जपना और दोहराना अधिक लाभदायक है।

हर वह श्वास जिसमें नाम की, भक्ति की और विश्वास की खुशबू होती है, एक ऐसे फूल की तरह जिसे अपने प्यारे सतिगुरु के चरण-कमलों पर चढ़ाया गया हो। यह फूल अपनी ताज़गी, खुशबू और आकर्षण को त्यागता नहीं और अन्त में यह अमर नाम ही, जपने वाले को सतिगुरु के पवित्र चरणों में ले जाता है।

समय और काल हर वस्तु का अन्त कर देता है किंतु दिव्य नाम में रंगे श्वासों पर यह अपना कोई अधिकार नहीं जमा सकता। श्री गुरु नानक साहिब जी के पवित्र चरणों में लीन ऐसे श्वासों के खुशबूदार फूलों तक काल की पहुँच नहीं होती। 

  • दिव्य नाम की सहायता से ही इस संसार के पाप-पंकिल समुद्र को तैर कर पार किया जा सकता है। व्यक्ति अहंकार रूपी भवरों में फंसा हुआ है। सतिगुरु के पवित्र चरणों का आश्रय लेने वाला अहंकार-रहित भक्त ही केवल इस भयानक सागर को पार कर सकता है।
  • दिव्य नाम का आनंदमय स्वाद संसार के बाकी सभी स्वादों को समाप्त कर देता है। 
  • परमात्मा से किया गया प्रेम सांसारिक और झूठे बंधनों की आसक्ति को मिटा देता है। 
  • दिव्य भूख और प्यास, सांसारिक भूख और प्यास को समाप्त कर देती है। 
  • सच्चे प्रेमी सिर्फ ईश्वरीय नाम का जाप करते है और निरन्तर ‘सिमरन’ से उनका हर काम परमात्मा की सेवा का हिस्सा बन जाता है।
  • परमात्मा का दिव्य नाम सच्ची तृप्ति प्रदान करता है और दुनियावी तड़प व लालसा से मुक्ति दिलाता है। 

यह सब कुछ दिव्य नाम से प्राप्त होता है। क्योंकि यह सारी सृष्टि नाम के सहारे पर खड़ी है, इसलिए मैंने इस पवित्र नाम की शरण ले ली है। मेरा मात्रा सहारा वह दिव्य नाम ही है। मन को नाम में टिकाए रखने से हमारा एक भी श्वास व्यर्थ नहीं जाता। सतिगुरु की कृपा और सच्ची प्रक्रिया से, बिना किसी बाधा के नाम लीनता अपने-आप बढ़ती जाती है। सांसारिक झमेलों में उलझे रहने के बावजूद नामलीनता चलती रहती है।

नाम मेरा रक्षक है, सूझ-बूझ देने और संभालने वाला है। नामी की ओर जाने वाले दैवी रास्ते पर मुझे प्रकाश दिखाने वाला है।

  • दिव्य नाम के प्रेमी के लिए नाम उसका भोजन है। इसलिए सांसारिक भूख उसे सताती नहीं।
  • नाम उसका नित्य का साथ है, वह कभी भी अकेला नहीं होता, इसलिए उसे और मित्रों की ज़रूरत नहीं पड़ती। 
  • नाम ही उसका सच्चा सहारा है इसलिए वह दूसरा सहारा नहीं ढूँढता। 
  • नाम ही उसका अस्तित्व है क्योंकि वह उसके बिना रह नहीं सकता। 
  • नाम ही उसका वास्तविक सम्मान है, इसलिए वह किसी सांसारिक सम्मान की परवाह नहीं करता। ईश्वरीय नाम के सच्चे प्रेम की शान में अपनी अलग शान बनाने-बढ़ाने का कोई स्थान नहीं है।
  • दिव्य नाम पर निर्भर करते हुए और ध्यान लगाते हुए व्यक्ति अपने नाम की पहचान भूल जाता है तथा परमात्मा के प्रकाशमय रूप की भक्ति करते हुए अपनी शारीरिक चेतना को भुला देता है।
  • दिव्य नाम और रूप से सच्चा संबंध आखिरकार आपको अपने नाम, मन और शरीर से अलग कर देता है।

प्यार करो, प्यार में ‘मैं’ छूट जाए, तभी प्राप्ति है।

बाबा नरिन्दर सिंह जी
सच्चा प्यार हृदय में बसता है। प्यार के शक्तिशाली प्रवाह से सच्ची प्रार्थना प्रिय परमात्मा के पवित्रा चरणों तक पहुँचती है। प्यार के इस तेज़ बहाव के साथ मनुष्य पूरी तरह बहता है और दैवी रूप में समा जाता है।

नाम रसि जो जन त्रिपताने ॥
मन तन नामहि नामि समाने ॥

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग 286
जहाँ नाम है वहाँ कौन-सी चीज नहीं?
जहाँ नाम नहीं है वहाँ कौन-सी चीज है?
बाबा नंद सिंह जी महाराज

हीरे में सभी पदार्थ हैं, चाहे सोना ले लो, चाहे गेहूँ (अन्न) ले लो कोई पदार्थ ले लो। (इसी तरह) नाम में सब कुछ है।

बाबा नंद सिंह जी महाराज

दूध से खोया बनाओ, रबडी बनाओ, चाहे तसमई बनाओ, भाँति-भाँति की मिठाई बनाओ।

दूध में जैसे सब मिठाइयाँ है, (उसी तरह) नाम में भी सभी बरकतें है।

बाबा नंद सिंह जी महाराज


नाम किसी पदार्थ के बदले नहीं मिलता है।
यह सिर्फ सिर का सौदा है।

बाबा नंद सिंह जी महाराज


जैसे शेरनी का दूध सोने के पात्र में ही समाता है, ऐसे ही नाम की अमर वस्तु भी उत्तम अधिकारी को ही मिलती है और वहीं शोभित होती है। जैसे वर्षा का जल टीलों पर नहीं टिकता और निचले तलों में समाता है, ऐसे ही नाम भी अहंकारियों को प्राप्त नहीं होता, जहाँ गरीबी (विनम्रता है) वहीं समाता है।

बाबा नंद सिंह जी महाराज

गुरु नानक दाता बख़्श लै बाबा नानक बख़्श लै

Smast Ilahi Jot Baba Nand Singh Ji Maharaj, Part 3

 By: Brig. Partap Singh Ji Jaspal

(Founder of Guru Nanak Daata Baksh Lai Mission)

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